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Acharya Vinoba Bhave’s 129th Birthday | 11 सितम्बर आचार्य विनोबा भावे / जयंती

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Acharya Vinoba Bhave’s 129th Birthday | 11 सितम्बर आचार्य विनोबा भावे / जयंती

Acharya Vinoba Bhave's 129th Birthday | 11 सितम्बर आचार्य विनोबा भावे / जयंती
Acharya Vinoba Bhave’s 129th Birthday | 11 सितम्बर आचार्य विनोबा भावे / जयंती

Acharya Vinoba Bhave’s 129th Birthday | 11 सितम्बर आचार्य विनोबा भावे / जयंती

जन्म : 11 सितंबर 1895

मृत्यु : 15 नवंबर 1982

भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी नेता, संत विनोबा भावे को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन। इन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है, और भारत का राष्ट्रीय अध्यापक भी कहा जाता है, जिस कारण लोग संत विनोबा भावे को आचार्य कहकर भी संबोधित करते हैं।

आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले के गागोड गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम ‘विनायक नरहरि भावे’ था। उनके पिता का नाम नरहरि शंभू राव व माता का नाम रुक्मिणी देवी था। उनकी माता एक विदुषी महिला थी। आचार्य विनोबा भावे का ज़्यादातर समय धार्मिक कार्य व आध्यात्म में बीतता था। बचपन में वह अपनी मां से संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर और भगवत् गीता की कहानियां सुनते थे। इसका प्रभाव, उनके जीवन पर काफी गहरा पड़ा और इस वजह से उनका रुझान, आध्यात्म की तरफ बढ़ गया।

आगे चलकर विनोबा भावे ने रामायण, कुरान, बाइबल, गीता जैसे अनेक धार्मिक ग्रंथों का, गहन अध्ययन किया। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, और अर्थशास्त्री भी थे। उनका संपूर्ण जीवन साधू, सन्यासियों व तपस्वी की तरह बीता। इसी कारण, उनको संत कहकर संबोधित किया जाने लगा।

वह इंटर की परीक्षा देने के लिए 25 मार्च, 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए, परंतु उस समय उनका मन स्थिर नहीं था। उन्हें लग रहा था कि वह जीवन में जो करना चाहते हैं, वह डिग्री द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनके जीवन का लक्ष्य, कुछ और ही था।

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अभी उनकी गाड़ी सूरत पहुंची ही थी कि उनके मन में हलचल होने लगी। गृहस्थ जीवन या सन्यास, उनका मन दोनों में से किसी एक को नहीं चुन पा रहा था। तब थोड़ा विचार करने के बाद, उन्होंने संन्यासी बनने का निर्णय लिया, और हिमालय की ओर जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए।

1916 में मात्र 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने घर छोड़ दिया और साधु बनने के लिए, काशी नगरी पहुंच गए। वहां पहुंचकर, उन्होंने महान पंडितों के सानिध्य में, शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उस समय, स्वतंत्रता आंदोलन भी अपनी चरम सीमा पर था।

महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत आ गए थे। तब विनोबा जी ने अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में, गांधी जी से पहली मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया और उन्होंने अपना पूरा जीवन गांधीजी को समर्पित कर दिया।

1921 से 1942 तक, वह अनेकों बार जेल गए। उन्होंने 1922 में नागपुर में सत्याग्रह किया, जिसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया। 1930 में विनोबा जी ने, गांधीजी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह को अंजाम दिया। 11 अक्टूबर, 1940 को प्रथम सत्याग्रही के रूप में गांधी जी ने विनोबा भावे को चुना।

समय के साथ गांधीजी और विनोबा जी के संबंध काफी मज़बूत होते गए। वह गांधी जी के आश्रम में रहने लगे, और वहां की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। आश्रम में ही उनको विनोबा नाम मिला।

विनोबा भावे ने गरीबी को खत्म करने के लिए, काम करना शुरू किया। 1950 में उन्होंने, सर्वोदय आंदोलन आरंभ किया। इसके तहत, उन्होंने ‘भूदान आंदोलन’ की शुरुआत की। 1951 में, जब वह आंध्रप्रदेश का दौरा कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात, कुछ हरिजनों से हुई, जिन्होंने विनोबा जी से 80 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने की विनती की।

विनोबा जी ने ज़मींदारों से आगे आकर अपनी ज़मीन दान करने का निवेदन किया, जिसका काफी ज़्यादा असर देखने को मिला और कई ज़मींदारों ने अपनी ज़मीनें दान में दीं। वहीं इस आंदोलन को पूरे देश में प्रोत्साहन मिला। 17 सितम्बर 1992 को हज़ारीबाग़ में इनके नाम पर “विनोबा भावे विश्वविद्यालय” इनके भूदान आंदोलन से प्राप्त जमीन पर स्थापित किया गया। विनोबा भावे जी को भूदान आंदोलन में सबसे ज्यादा जमीन हज़ारीबाग़ में मिली थी।

1959 में उन्होंने, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, ब्रह्म विद्या मंदिर की स्थापना की। स्वराज शास्त्र, गीता प्रवचन और तीसरी शक्ति उनकी लिखी किताबों में से प्रमुख है।

नवंबर 1982 में विनोबा भावे गंभीर रूप से बीमार हो गए और उन्होंने अपने जीवन को त्यागने का फैसला किया। उन्होंने जैन धर्म के संलेखना-संथारा के रूप में भोजन और दवा को त्याग दिया और इच्छा पूर्वक मृत्यु को अपनाने का निर्णय लिया। 15 नवंबर, 1982 को विनोबा भावे ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

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